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Showing posts from September, 2019
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इमाम बाड़े मुसन्निफ़ - मौलाना ततहीर अहमद रज़वी बरेलवी जहाँ ताज़िये को रखते हैं इस इमारत को इमाम बाड़ा कहते हैं, ये इमाम बाड़े बनाना और उनकी ताज़ीम करना ये सब राफ़ज़ी फ़िरके की देन है, इमाम बाड़े की कोई शरई हैसियत नहीं, उनकी ज़मीनें किसी बाल बच्चेदार बेघर ग़रीब मुसलमान को दे दी जाएं और उसका सवाब हज़रत इमाम आली मक़ाम की रूह पाक को ईसाल कर दिया जाए तो ये एक इस्लामी काम होगा, या वहां जरूरत हो तो मस्जिद बनादी जाए या मुसलमानों के लिए क़ब्रिस्तान या मुसाफ़िर खाना वगैरह जिससेक़ौम को नफ़अ पहुंचे तो निहायत उम्दा बात है। आला हज़रत इमाम अहमद रज़ा खां फ़ाज़िले बरेलवी अलैहिर्रहमा फरमाते हैं:- "इमाम बाड़ा वक़्फ नहीं हो सकता वो जिसने बनाया वो उसी की मिल्क है जो चाहे करें वो न रहा तो उसके वारिसों की मिल्क है उन्हें इख्तियार है" (फतावा रज़विया, जि.16, स.121) (मुहर्रम मे क्या जाइज़ ?क्या नाजाइज़ ?  41)
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मसनोई और फ़र्ज़ी करबलायें मुसन्निफ़ - मौलाना ततहीर अहमद रज़वी बरेलवी करबला इराक़ में उस जगह का नाम है जहां हज़रत इमाम आली मक़ाम अपने साथियों के साथ यज़ीदी फौजों के हाथ शहीद किये गए थे। अब जहाँ ताज़िये जमा और फिर दफन किये जाते हैं उन जगहों को लोग करबला कहने लगे, मजहबे इस्लाम में इन फ़र्ज़ी करबलाओं की कोई हैसियत नहीं उन्हें मुक़द्दस मक़ाम ख़्याल करके उनका एहतिराम करना सब राफ़ज़ीयत और जिहालत की पैदावार है।आला हज़रत इमाम अहमद रज़ा खां बरेलवी अलैहिर्रहमा फरमाते हैं:- अलम, ताज़िये, मेहंदी, उनकी मन्नत गश्त चढ़ावा, ढोल ताशे, मुजीरे, मरसिये, मातम, मसनोई करबला जाना ये सब बातें हराम व नाजाइज़ व गुनाह हैं। (फतावा रज़विया, जि.24, स.496) कुछ जगहों पर औरतें रात को चिराग़ लेकर करबला जाती हैं, और ख़्याल करती हैं कि जिसका चिराग़ जलता हुआ पहुँच गया उसकी मुराद पूरी हो गई, ये सब जाहिलाना बातें हैं ऐसी वहम परस्ती की इस्लाम में कोई गुंजाइश नहीं है (मुहर्रम मे क्या जाइज़ ?क्या नाजाइज़ ?  40)
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ज़बरदस्ती के चन्दे मुसन्निफ़ - मौलाना ततहीर अहमद रज़वी बरेलवी ताज़ियादारी के नाम पर ताजियेदारों के लिए ज़बर7दस्ती गरीबों के घरों में घुस घुसकर चन्दे लेना और मना करने वालों को या कम देने वालों को धक्कियां देना उनके बर्तन भाड़े उठाकर ले जाना, तरह तरह से उन्हें तंग करना एक आम बात हो गई है। मुसलमानों की इज़ारसानी है, और सख़्त हराम है। मस्जिदें और मदरसे जो इस्लाम की असल है। ज़बरदस्ती चन्दे तो उनके लिए भी नहीं करना चाहिए, चे जाए कि ताज़ियादारी! वो तो एक हराम काम है उसकी वजह से गरीबों का खून चूसना दोहरा हराम है। और अल्लाह तआला और उसके रसूल सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम को नाराज़ करना है, चन्दे करने में ये लोग इस क़द्र ज़ालिम बन गए हैं कि अगर कोई भला शरीफ़ आदमी ताज़ियादारी को नाजाइज़ समझते हुए उन्हें चन्दे न दे तो उस पर जुल्म करते हैं उसका बॉयकॉट करने की कोशिश करते हैं गोया की ताज़ियादारों की क़ौम सरकशी में हद से आगे बढ़ चुकी है, सही लोगो को चाहिए कि उनका ज़ुल्म बर्दाश्त करले लेकिन उन्हें चन्दे हरगिज़ न दें। आजकल हिन्दुस्तान का मुसलमान बे रोजगारी और ग़रीबी का शिकार है और ऊपर से ये ज़बरदस्ती के चन्दे वो भी फ़ाल...
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ताज़ियादारी बन सकती है कभी बूत परस्ती मुसन्निफ़- मौलाना ततहीर अहमद रज़वी बरेलवी ताज़ियादार अगरचे हमारे सुन्नी मुसलमान भाई ही हैं खुदाए पाक उन्हें समझ अता फरमाए। ताज़ियादारी और उसके साथ जो ख़िलाफ़े शरअ काम वो करते हैं उससे महफूज़ फरमाए, लेकिन चूंकि ताज़िया एक मुजस्समा है, लोग इसमे तरह तरह के फोटो और तस्वीरें भी लगाने लगे हैं उसको चूमते बल्कि सज्दे तक करने लगे हैं, चढ़ावे भी चढाये जाने लगे हैं यानी मुशरिक लोग अपने बुतों के साथ जो करते हैं एअतिक़ादन न सहीह अमलन वो सब कुछ होने लगा है, ख़तरा महसूस हो रहा है कि ताज़ियादारी कहीं आने वाले वक़्त में बूत परस्ती न बन जाए, क्योंकि सब लोग पढ़े लिखे और समझदार नहीं होते, अनपढों जाहिलों की भी दुनियां में कमी नहीं है। लिहाज़ा मैं अपने सुन्नी अवाम व ख़ास भाइयों से गुज़ारिश करूँगा की वो ख़ुद भी इससे बाज़ रहें और दूसरों को भी प्यार व मुहब्बत से समझाकर बाज़ रखने की कोशिश करें। (मुहर्रम मे क्या जाइज़ ?क्या नाजाइज़ ?  38)
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बरेली शरीफ़ की ताज़ियेदारी मुसन्निफ़- मौलाना ततहीर अहमद रज़वी बरेलवी कुछ लोग ये भी कहते सुने गए हैं कि ताज़ियादारी अगर नाजाइज़ व हराम है तो बरेली शरीफ़ जहाँ आला हज़रत अहमद रज़ा खां अलैहिर्रहमा बरेलवी पैदा हुए और रहे वहाँ ताज़ियादारी क्यों होती है, तो उनकी ये दलील सही नहीं। दुनियां में सब जगह सब तरह के लोग रहते हैं उलमा ए किराम की बातें मानने वाले भी हैं और न मानने वाले भी, फरमाबरदार भी हैं और नाफ़रमान भी, बरेली शरीफ़ में एक ताज़ियादारी ही नहीं बहुत से गलत काम होते हैं, शराब नोशी, जुएबाजी, सूदख़ोरी, नाच तमाशे, बदकारी बेहयाई, बेपर्दगी, सिनेमा और पिक्चर बाजी, तो क्या उन सब की ज़िम्मेदारी आला हज़रत अलैहिर्रहमा के सर डाली जाएगी? उलमा ए किराम की ज़िम्मेदारी समझाना है दिल में डालना अल्लाह तआला का काम है और ताक़त से रोकना अहले सल्तनत व हुक़ूमत का काम है, आला हज़रत  अलैहिर्रहमा तो आलिमे दीन और नाइबे रसूल हैं। नबियों और रसूलों के ज़माने में भी उनकी बस्तियों में बड़ी तादाद नाफ़रमान और सरकशों की रही है हज़रत नूह अलैहिस्सलाम की बीवी और उनके बेटे और हज़रत लूत अलैहिस्सलाम की बीवी की सरकशी और नाफ़रमानी का ज़िक्र...
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  ताज़ियेदारी और उलमा ए अहले सुन्नत मुसन्निफ़- मौलाना ततहीर अहमद रज़वी बरेलवी कुछ लोग समझते हैं कि ताजियेदारी सुन्नियों का काम है और उसके रोकना, मना करना वहाबियों का। हालांकि जब से ये ग़ैर शरई ताजियेदारी राइज़ हुई है किसी भी ज़िम्मेदार सुन्नी आलिम ने उसे अच्छा नहीं कहा है। हिन्दुस्तान में दौरे वहाबियत से पहले के आलिम व बुज़ुर्ग हज़रत शाह अब्दुलअज़ीज़ मुहद्दिस देहलवी रहमतुल्लाहि तआला अलैहि लिखते है:- यानी अशरा मुहर्रम में जो ताज़ियेदारी होती है गुम्बदनुमा ताज़िये और तस्वीरें बनाई जाती है ये सब नाजाइज़ है। (फतावा अज़ीज़िया, जि.1, स.75) आला हज़रत मौलाना अहमद रज़ा खां बरेलवी रहमतुल्लाही तआला अलैहि जो इमाम अहले सुन्नत हैं जिनका फतावा अरब व अज़म में माना जाता है वो फरमाते हैं:- "अब कि ताज़ियादारी उस तरीक़ा-ए-ना मरज़िया का नाम है क़तअन बिदअत व नाजाइज़ व हराम है" (फतावा रज़विया, जि.24, स.513, मतबूआ रज़ा फाउंडेशन लाहौर) कुछ लोग कहते हैं कि ताज़िया बनाना जाइज़ है घुमाना नाजाइज़ है आला हज़रत ने उसका भी रद फरमाया और बनाने से भी मना फरमाया, वो लिखते हैं:-"मगर उस नक़्ल में भी अहले बिदअत से एक मुशाबिहत...
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ताज़ियेदारी और क़ुरआन व हदीस मुसन्निफ़-मौलाना ततहीर अहमद रज़वी बरेलवी क़ुरआन करीम में है:- और उन लोगो से दूर रहो जिन्होंने अपने दीन को खेल तमाशा बना लिया और उन्हें दुनियां की ज़िंदगी ने धोका दे दिया है। (पारा-7, रुकू-14) और एक जगह फरमाता है:- जिन लोगो ने अपने दीन को खेल तमाशा बना लिया और दुनियां की ज़िंदगी ने उन्हें धोके में डाल दिया, आज उन्हें हम छोड़ देंगे जैसा उन्होंने उस दिन के मिलने का ख़्याल छोड़ रखा था, और जैसा वो हमारी आयतों से इन्कार करते थे। (पारा-8, रुकू-13) इन आयतों को आप ध्यान से पढ़ें तो आज की ताजियेदारी और उर्सों के नाम पर जो मेले ठेले नाच तमाशे और क़व्वालीयां हो रही हैं ये सब चीजें याद आ जाएंगी, और नज़रे इंसाफ कहेगी की वाक़ई ये वो लोग हैं जिन्होंने इस्लाम को तमाशा बना कर रख दिया और मज़हब को हंसी खेल की शक़्ल दे दी। ख़ुदा ए तआला तौफ़ीक़ दे इंसान को चाहिए कि मरने से पहले आँखे खोल ले और होश में आ जाए। क़ुरआन करीम में जगह जगह अल्लाह तआला ने रंज व मुसीबत हादसात वगैरह पर सब्र करने का हुक्म दिया है न कि रोने पीटने चीखने पुकारने सीने कूटने और मातम करने का क़ुरआन मे मुसीबत ...
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ताज़ियेदारी लड़ाई झगड़े की बुनियाद मुसन्निफ़ - मौलाना ततहीर अहमद रज़वी बरेलवी लड़ाई झगड़े करना तो अक्सर जगह तअज़िये दारों की आदत बन गई है,रास्तों के लिए खड़ी फसलों को रोन्दना,अपनी वाह वाही और शान शैखी के लिए एक दूसरे से मुकाबिले करना,खुब ऊँचे ऊँचे ताअज़िये बनाकर उन्हें निकालने के लिए बिज़ली के तार या खड़े दरख्तों को काटना तरह तरह से खुदा तआला की मखलूक को सताना उनका मिज़ाज हो गया है। इन सब बातों में कभी कभी गैर मुस्लिमों से भी टकराव की नौबत आ जाती है,और यह सब बे मक़सद झगड़े होते हैं। मुसलमानों की तारीख में कभी भी इन गैर ज़रूरी फालतू बातों के लिए लड़ाइयाँ नहीं लड़ी गयीं और मुसलमान फितरतन झगड़ालू नहीं होता।  तअज़िये दारों को तो मैंने देखा कि यह लोग तअज़िये उठा कर मातम करते हुये ढोल बाजों के साथ चलते हैं तो होश खो बैठते हैं बे काबू और आपे से बाहर हो जाते हैं जोश ही जोश दिखाई देता है। ख़ुदा न करे मैं हर मुसलमाने मर्द व औरत की जान माल,इज्ज़त व आबरू की सलामती की अल्लाह तआला से दुआ करता हूँ लेकिन इस बढ़ती हुई तअज़िये दारी और तअज़िये उठाते वक़्त ताज़ियेदारों के बे काबू जोशीले रंग से...