बरेली शरीफ़ की ताज़ियेदारी
मुसन्निफ़- मौलाना ततहीर अहमद रज़वी बरेलवी
हाँ ये बताइये कि आला हज़रत अलैहिर्रहमा ने कभी ताज़ियादारी को जाइज़ कहा हो या उसकी इजाज़त दी हो तो ये आप कभी साबित नहीं कर सकते, क्योंकि उन्होंने हमेशा उसकी मुख़ालिफत की, जो काम भी उनकी किताबों से ज़ाहिर है, और उनकी औलाद के किरदार, तरीक़ा-ए-कार से। खानवादे के हज़रात आज भी ताज़ियादारी के मुख़ालिफ़ हैं, इसमे न कभी शरीक़ होते हैं न उसे चंदा देते हैं, बल्कि उनसे जहाँ तक मुमकिन है रोकने की कोशिश करते हैं, और बरेली शरीफ़ में जो अहले सुन्नत के दारुलइफ्ता हैं उनमें से किसी भी दारुलइफ्ता से ताज़ियादारी के नाजाइज़ व हराम होने का फ़तवा आज भी आसानी से लिया जा सकता है, ताज़ियेदार फ़तवा तो कभी लेते ही नहीं और झूंठे प्रोपगंडे करते फिरते हैं।
रही ये बात कि बरेली शरीफ़ में ताज़ियादारी कब से शुरू हुई तो क़िस्सा ये है कि अब से तक़रीबन 250 साल पहले बरेली शरीफ़ और रोहिलखण्ड का सारा इलाक़ा नवाब हाफ़िज़ रहमत खां रहमतुल्लाहि तआला अलैहि के ज़ेरे इक़्तिदार था अंग्रेज़ उनसे घबराते थे, कई लड़ाइयों में उनके मुक़ाबिल से अंग्रेज़ हार कर भागे थे, लेकिन 1774 ईसवी की जंग जो मीरानपुर कटरा के नज़दीक लड़ी गई थी लखनऊ के राफ़ज़ी नवाब ने हाफ़िज़ रहमत खां साहब के मुक़ाबिले पर अंग्रेजों का साथ दिया हाफ़िज़ रहमत खां साहब बड़ी बहादुरी से लड़े आख़िरकार शहीद हुए और और अंग्रेजों की मेहरबानी से बरेली का कुछ इलाक़ा कुछ सालों के लिए लखनऊ के राफ़ज़ी नवाब के ज़ेरे हुक़ूमत आ गया, राफ़ज़ियत का दौर दौरा शुरू हुआ इमामबाड़े बनें नवाब आसिफुद्दौला के नाम पर बड़े बाज़ार में लबे सड़क शियाओं की आस्फिया मस्जिद बनाई गई जो अब भी है, क़ुदरती तौर पर उसका एक मीनार ऊपर से आधा टूट गया है। राफ़ज़ियत के असरात से इसी दौर में ताज़ियादारी शुरू हुई, और यहाँ तक ज़ोर बढ़ा की किले वाली जामा मस्जिद की सेहदरी तक ताज़िये रख दिये गए, और मस्जिद के इस हिस्से को इमामबाड़ा कहा जाने लगा ये राफ़ज़ी हुक़ूमत के असर से हुआ।
ये आला हज़रात के दादा बुज़ुर्गवार इमामुलउलमा मौलाना रज़ा अली खां अलैहिर्रहमा का ज़माना था उन्होंने इस सब के ख़िलाफ़ बहुत सख़्त फ़तवा दिया, यहाँ तक कि हुक़ूमत की परवाह किये बग़ैर अपने असर व रुसूख का इस्तेमाल करके ख़ुद जामा मस्जिद जा कर वहाँ से ताज़िये हटवाए थे। हवाले सुबूत और तफसील के लिए देखें:- (हयाते मुफ्तिये आज़म, मुसन्नाफ़ा जनाब मिर्ज़ा अब्दुलवहीद बेग मरहूम, स.22, मतबुआ इदारा तहक़ीक़ात मुफ्तिये आज़म बाज़ार सन्दल खां बरेली शरीफ़)
खुलासा ये कि ताज़ियादारी और उसकी खुराफातें राफ़ज़ीयों के इक़्तिदार नवाबी के दौर की देन है, रामपुर, पीलीभीत, शाहजहांपुर, और बदायूं वगैरह में भी इमाम हुसैन के नाम पर ये तमाशे मेले ठेले तभी से शुरू हुए हैं,
अपने सुन्नी भाइयों से गुज़ारिश करूँगा कि राफ़ज़ीयत की इन निशानियों को मिटायें और सच्चे अहले सुन्नत और मसलके आला हज़रत वाले बनकर रहें।
(मुहर्रम मे क्या जाइज़ ?क्या नाजाइज़ ? 34)

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