ताज़ियेदारी और क़ुरआन व हदीस
मुसन्निफ़-मौलाना ततहीर अहमद रज़वी बरेलवी
क़ुरआन करीम में है:- और उन लोगो से दूर रहो जिन्होंने अपने दीन को खेल तमाशा बना लिया और उन्हें दुनियां की ज़िंदगी ने धोका दे दिया है। (पारा-7, रुकू-14)
और एक जगह फरमाता है:- जिन लोगो ने अपने दीन को खेल तमाशा बना लिया और दुनियां की ज़िंदगी ने उन्हें धोके में डाल दिया, आज उन्हें हम छोड़ देंगे जैसा उन्होंने उस दिन के मिलने का ख़्याल छोड़ रखा था, और जैसा वो हमारी आयतों से इन्कार करते थे। (पारा-8, रुकू-13)
क़ुरआन करीम में है:- और उन लोगो से दूर रहो जिन्होंने अपने दीन को खेल तमाशा बना लिया और उन्हें दुनियां की ज़िंदगी ने धोका दे दिया है। (पारा-7, रुकू-14)
इन आयतों को आप ध्यान से पढ़ें तो आज की ताजियेदारी और उर्सों के नाम पर जो मेले ठेले नाच तमाशे और क़व्वालीयां हो रही हैं ये सब चीजें याद आ जाएंगी, और नज़रे इंसाफ कहेगी की वाक़ई ये वो लोग हैं जिन्होंने इस्लाम को तमाशा बना कर रख दिया और मज़हब को हंसी खेल की शक़्ल दे दी। ख़ुदा ए तआला तौफ़ीक़ दे इंसान को चाहिए कि मरने से पहले आँखे खोल ले और होश में आ जाए।
क़ुरआन करीम में जगह जगह अल्लाह तआला ने रंज व मुसीबत हादसात वगैरह पर सब्र करने का हुक्म दिया है न कि रोने पीटने चीखने पुकारने सीने कूटने और मातम करने का क़ुरआन मे मुसीबत और परेशानी पर सब्र करने से मुतअल्लिक़ आयतों को जमा किया जाए तो अच्छी खासी एक किताब तैयार हो जाएगी।
हदीस शरीफ़ में है रसूले ख़ुदा सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने फरमाया:- जो (मय्यत के ग़म में) गाल पीटे, गरेबान फाड़े, और ज़माना ए जाहिलियत की सी चीख़ व पुकार मचाये वो हम में से नहीं। (सही बुखारी जि.1,स.173)
हुज़ूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की एक सहाबिया हज़रत उम्मे अत्तिया रदियल्लाहु तआला अन्हा कहती हैं:- रसूले ख़ुदा सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने हम को नोहा करने से मना फरमाया। (सही बुख़ारी, जि.2, स.726)
एक हदीस में है रसूले ख़ुदा सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने फरमाया:- अल्लाह अज़्ज़ व जल ने मुझ को ढोल बाजे और बांसुरियों को मिटाने का हुक्म दिया। (मिशक़त स.318, किताबुलइमारत फ़सल सालिस)
उसके अलावा एक और हदीस में है हुज़ूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम फरमाते है:- "मेरी उम्मत में ऐसे लोग होंगे जो ज़िनाकारी, रेशम, शराब और ढोल बाजो को हलाल कर लेंगे"
इस हदीस से हुज़ूर ने ढोल बाजों को ज़िनाकारी शराब वगैरह के साथ शुमार फरमाया है। (सही बुख़ारी, जि.2, किताबुलअशरिबा स.837)
मशहूर सहाबी हज़रत जाफ़र तैयार रदियल्लाहु तआला अन्हु जंगे मूता में शहीद हुए, उनकी शहादत की ख़बर जब मदीना शरीफ़ में आई तो उनके घर वाले ग़म मनाने लगे 3 दिन तक के लिए हुज़ूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने इजाज़त दी उस के बाद हुज़ूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम उनके घर ख़ुद तशरीफ़ लाये और फरमाया:- आज के बाद मेरे मेरे भाई जाफ़र (रदियल्लाहु तआला अन्हु) के लिए कोई न रोये। (मिशकात बाबूत्तरज्जल स.382)
एक हदीस पाक में हुज़ूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने फरमाया:- लोगो मे दो बातें काफिरों वाली हैं, किसी के नसब में तअन करना और मय्यत पर नोहा करना। (सही मुस्लिम, जि.1, स.58)
रहा हज़रत सय्येदिना अमीर हमज़ा रदियल्लाहु तआला अन्हु की जंगे उहद में शहादत के बाद हुज़ूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के हुक़्म पर बनू अब्दुलअशहल की औरतों का ग़म मनाना या रोना तो उस वाकिए के उलमा ने कई जवाबात दिए हैं उन सबकी तफसील का यहाँ मौक़ा नहीं, मैं ताजियेदारों मातम व सीना पीटने वालों से पूछता हूँ कि क्या जंगे उहद की तारीख़ पर मदीने शरीफ में हर साल ये हुआ करता था? जंगे उहद के तकरीबन 7 साल तक हुज़ूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम दुनियां में तशरीफ़ फरमा रहे किसी एक साल का वाकिया भी किसी हदीस में हो तो ज़रा बताये। इस हदीस से मौत व शहादत के बाद चंद दिन तक ग़म मनाना साबित हो सकता है लेकिन बार बार या हर साल तजदीदे हुजन का सुबूत नहीं। और मौत व शहादत के बाद चंद यानी 3 दिन ग़म मनाने की इजाज़त का ज़िक्र हम पहले ही कर चुके हैं, जंगे उहद से वापसी में मदीने शरीफ़ में जिन घरों के मर्द शहीद हुए थे वहाँ ग़म मनाये गए थे लेकिन उसके बाद किसी साल किसी ने ऐसा किया हो तो बताएं जब उहद की लड़ाई में शरीक रहने वाले सहाबा और उनके घर वाले तो 50 साल से भी ज़्यादा दुनियां में रहे होंगे। उनकी औलाद और मानने वाले तो आज भी हैं। क्या कहीं जंगे उहद के शहीदों, ख़ासकर हज़रत अमीर हमज़ा रदियल्लाहु तआला अन्हु की शहादत का ग़म मनाया जाता है?
(मुहर्रम मे क्या जाइज़ ?क्या नाजाइज़ ? सफ़हा 27)

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