ताज़ियेदारी लड़ाई झगड़े की बुनियाद
मुसन्निफ़ - मौलाना ततहीर अहमद रज़वी बरेलवी
तअज़िये दारों को तो मैंने देखा कि यह लोग तअज़िये उठा कर मातम करते हुये ढोल बाजों के साथ चलते हैं तो होश खो बैठते हैं बे काबू और आपे से बाहर हो जाते हैं जोश ही जोश दिखाई देता है। ख़ुदा न करे मैं हर मुसलमाने मर्द व औरत की जान माल,इज्ज़त व आबरू की सलामती की अल्लाह तआला से दुआ करता हूँ लेकिन इस बढ़ती हुई तअज़िये दारी और तअज़िये उठाते वक़्त ताज़ियेदारों के बे काबू जोशीले रंग से मुझ को तो हिन्दुस्तान में ख़तरा महसूस हो रहा है,कभी उसकी वजह से मुसलमानों का बड़ा नुक़्सान हो सकता है,और यह बे नतीजा नुक्सान होगा,और यह अन्ज़ाम से बे ख़बर लोग कभी भी कौम को दंगों और बलवों की आग में झोंक सकते हैं। कुछ जगह ऐसा हुआ भी है और कही होते होते बच गया है।
अभी चन्द साल पहले अख़बार में आया था कि तअज़िये दारों ने एक हिन्दू का आठ बीघा खेत रोन्द डाला बड़ी मुश्किल से पुलिस ने दंगे पर कन्ट्रोल किया, दर असल यह सब मुसलमानों को तबाह व बरबाद कराने वाले काम हैं।
आम रास्तों को बन्द करने, सड़कों पर जाम लगाने में भी तअज़िये दारों को बहुत मज़ा आता है और वह ऐसा कर के बहुत खुश होते हैं और उसको बड़ा कमाल समझते हैं,हांलाकि इस्लामी नुक्ता-ए-नज़र से यह रिफाहे आम में मुदाख़लत है,अवाम की हक़ तल्फ़ी नाजाइज़ व गुनाह है।
हदीस पाक में है हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने फरमाया! जो जिहाद के लिये जाने वाला किसी गुज़रने वाले के लिये रास्ता तंग करे उसको जिहाद का सवाब नहीं!(मिश्कात बाब आदादुस्सफर सफ़हा 340)
उलमा-ए-किराम ने भी इस हरकत के नाजाइज़ होने का फतवा दिया है। इस की तहकीक़ हमारी किताब बारहवही शरीफ़ जलसे और जुलूस में देखे मज़हब और धरम के नाम पर आज कल ऐसा बहुत किया जा रहा है।
मज़हब मख़लूक़ की मुश्किलात को दूर करने का नाम है उन्हें परेशान करना और मुश्किलात में डालना मज़हब नहीं हैं, जब सड़के जाम होती हैं तो किस किस को कैसी मुसीबत और परेशानी का सामना करना पड़ता है ये सबको ख़ूब पता है, लेकिन धर्म के ठेकेदारों का धर्म आज कल उस वक़्त तक मुकम्मल नहीं होता जब तक कि वो पब्लिक का खून न पी लें।
दूसरे लोग अपने धर्मों के नाम पर क्या करते हैं उसके ज़िम्मेदार तो वो हैं लेकिन हमें उनकी शरीकी नहीं करना चाहिए, और अपने मज़हब की असली शक़्ल दुनियां के सामने लाना चाहिए, हमारे मज़हब में किसी को सताने की कोई गुंजाइश नहीं, रहगुजर तंग करना या बन्द करना या राहगीरों, मुसाफिरों को परेशान करना बड़ा ज़ुल्म व ज़्यादती है। इमाम हुसैन रदियल्लाहु तआला अन्हु के मानने वालों को तो ऐसा कभी भी नहीं करना चाहिए, क्योकि उन्होंने दूसरों को यज़ीदी मज़ालिम से बचाने के लिए ही अपना गला कटाया था और आप उनका नाम लेकर ही दूसरों पर ज़ुल्म करते हैं और उनके लिए मुसीबत बन जाते हैं।
कुछ लोग कहते हैं कि ताज़ियादारी अगर हराम है तो मौलवी पहले भी तो थे उन्होंने मना क्यों नहीं किया, तो मेरे भाइयों! बात ये है कि ताजियेदारी शुरू होने के बाद धीरे धीरे नाजाइज़ कामों पर मुश्तामिल होती चली गई और जब से ये ख़िलाफ़े शरअ हरकात व खुराफ़ात का मजमुआ बनी है, उलमा ए दीन बराबर उसको हराम कहते और लिखते रहे, जैसा कि आने वाले बयान से आपको मालूम होगा। और हर ज़माने में मानने वाले भी रहे हैं और न मानने वाले भी, और मौलवी भी सब अल्लाह तआला से डरने वाले नहीं होते मख़लूक़ से डरने वाले और लोगो की हां में हां मिलाने वाले कुछ मौलवी पहले भी रहे हैं, और अब भी हैं और आज के मस्जिदों के इमामों का किसी ख़िलाफ़े शरअ बात को देखकर कुछ न कहना कोई मअना नहीं रखता क्योकि इमामत तो अब नौकरी व गुलामी सी हो कर रह गई है, अगर एक आदमी भी नाराज़ हो जाए तो इमामत ख़तरे में पड़ जाती है। लेकिन फिर भी मेरी गुजारिश है कि हिम्मत से काम लेना चाहिए और सही बात लोगो को बताना चाहिए छुपाना नहीं चाहिए, अल्लाह तआला उनकी मदद फरमाता है जो उसके दीन की मदद करते हैं।
मौलवियों में आज कुछ ऐसे भी हैं जिन के पेट अल्लाह ने भर दिए हैं लेकिन ये बहुत ज़्यादा माल व दौलत शान व शौकत हासिल करने के लिए दींन को नुकसान पहुंचाते हैं गलत बयानी करते हैं हक़ को छुपाते हैं और ये नहीं जानते हैं कि इज़्ज़त व दौलत अल्लाह तआला के दस्ते कुदरत में है, जिसे जब चाहे अता फरमाए ये मौत को भूल गए हैं लेकिन मौत इन्हें नहीं भूलेगी ।
(मुहर्रम मे क्या जाइज़ ?क्या नाजाइज़ ? सफ़हा 23)

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