ज़बरदस्ती के चन्दे
मुसन्निफ़ - मौलाना ततहीर अहमद रज़वी बरेलवी
ताज़ियादारी के नाम पर ताजियेदारों के लिए ज़बर7दस्ती गरीबों के घरों में घुस घुसकर चन्दे लेना और मना करने वालों को या कम देने वालों को धक्कियां देना उनके बर्तन भाड़े उठाकर ले जाना, तरह तरह से उन्हें तंग करना एक आम बात हो गई है। मुसलमानों की इज़ारसानी है, और सख़्त हराम है। मस्जिदें और मदरसे जो इस्लाम की असल है। ज़बरदस्ती चन्दे तो उनके लिए भी नहीं करना चाहिए, चे जाए कि ताज़ियादारी! वो तो एक हराम काम है उसकी वजह से गरीबों का खून चूसना दोहरा हराम है। और अल्लाह तआला और उसके रसूल सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम को नाराज़ करना है, चन्दे करने में ये लोग इस क़द्र ज़ालिम बन गए हैं कि अगर कोई भला शरीफ़ आदमी ताज़ियादारी को नाजाइज़ समझते हुए उन्हें चन्दे न दे तो उस पर जुल्म करते हैं उसका बॉयकॉट करने की कोशिश करते हैं गोया की ताज़ियादारों की क़ौम सरकशी में हद से आगे बढ़ चुकी है, सही लोगो को चाहिए कि उनका ज़ुल्म बर्दाश्त करले लेकिन उन्हें चन्दे हरगिज़ न दें। आजकल हिन्दुस्तान का मुसलमान बे रोजगारी और ग़रीबी का शिकार है और ऊपर से ये ज़बरदस्ती के चन्दे वो भी फ़ालतू बातों के लिए अफ़सोस की बात है। खुदाए तआला पैसे दे तो फालतू बातों में ख़र्च नहीं करना चाहिए, अपनी ज़रूरियात और राहे ख़ुदा में ख़र्च करें, हुक़ूक़ अदा करें और उसके बाद अगर पैसे को बचा कर भी रखें तो उसमें कोई गुनाह नहीं, क्योंकि पैसा वक़्त पर आदमी के काम आता है इंसान की जान व माल इज़्ज़त व आबरू की हिफाज़त करता है और दूसरों के सामने हाथ फैलाने और ज़लील होने से बचाता है। मैं कहता हूं कि गरीबों मज़दूरों को इस्लाम में देना और उनकी मदद करना आया है नकि उन्हें नोचना खसोटना और उनसे चन्दे लेना। जलसे, जुलूसों के नाम पर भी गरीबों मज़दूरों से चन्दा नहीं करना चाहिए।
(मुहर्रम मे क्या जाइज़ ?क्या नाजाइज़ ? 38)

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