ताज़ियेदारी और उलमा ए अहले सुन्नत

मुसन्निफ़- मौलाना ततहीर अहमद रज़वी बरेलवी


कुछ लोग समझते हैं कि ताजियेदारी सुन्नियों का काम है और उसके रोकना, मना करना वहाबियों का। हालांकि जब से ये ग़ैर शरई ताजियेदारी राइज़ हुई है किसी भी ज़िम्मेदार सुन्नी आलिम ने उसे अच्छा नहीं कहा है।
हिन्दुस्तान में दौरे वहाबियत से पहले के आलिम व बुज़ुर्ग हज़रत शाह अब्दुलअज़ीज़ मुहद्दिस देहलवी रहमतुल्लाहि तआला अलैहि लिखते है:-
यानी अशरा मुहर्रम में जो ताज़ियेदारी होती है गुम्बदनुमा ताज़िये और तस्वीरें बनाई जाती है ये सब नाजाइज़ है। (फतावा अज़ीज़िया, जि.1, स.75)
आला हज़रत मौलाना अहमद रज़ा खां बरेलवी रहमतुल्लाही तआला अलैहि जो इमाम अहले सुन्नत हैं जिनका फतावा अरब व अज़म में माना जाता है वो फरमाते हैं:- "अब कि ताज़ियादारी उस तरीक़ा-ए-ना मरज़िया का नाम है क़तअन बिदअत व नाजाइज़ व हराम है" (फतावा रज़विया, जि.24, स.513, मतबूआ रज़ा फाउंडेशन लाहौर)
कुछ लोग कहते हैं कि ताज़िया बनाना जाइज़ है घुमाना नाजाइज़ है आला हज़रत ने उसका भी रद फरमाया और बनाने से भी मना फरमाया, वो लिखते हैं:-"मगर उस नक़्ल में भी अहले बिदअत से एक मुशाबिहत और ताज़ियेदारी की तोहमत का खदशा और आइन्दा अपनी औलाद व अहले एअतिक़ाद के लिए इब्तिलाये बिदअत का अन्देशा है। लिहाज़ा रोज़ा-ए-अक़दस हुज़ूर सय्यदुश्शोहद की ऐसी तस्वीर भी न बनाएं" (फतावा रज़विया, जि.24, स.513)
जो लोग कहते हैं कि ताज़िया बनाकर अहले सुन्नत का काम है वो आला हज़रत की किताबों का मुताअला करें पचासों जगह उनकी किताबों में ताजियेदारी को नाजाइज़ व हराम और गुनाह लिखा है बल्कि पूरा एक रिसाला उसी बारे में तस्नीफ फरमाया हैं, जिसका नाम है
        "اعالى الافادة فى تعزيه الهند و بيان شهادة"
सय्यदी मुफ्तिये आज़म मौलाना शाह मुस्तफा रज़ा खां अलैहिर्रहमा फरमाते हैं:-  "ताजियेदारी शरअन नाजाइज़ है" (फतावा मुस्तफ़विया, स.534, मतबुआ रज़ा एकेडमी मुम्बई)
सदरुश्शरीआ हज़रत मौलाना अमजद अली साहब आज़मी अलैहिर्रहमा ताजियेदारी और उसके साथ जगह जगह जो ख़िलाफ़े शरअ हरकात व बिदआत राइज हैं उनका ज़िक़्र करके लिखते हैं:-
"ये सब महज़ खुराफ़ात है उन सबसे हज़रत सैय्यदिना इमाम हुसैन रदियल्लाहु तआला अन्हु ख़ुश नहीं हैं"
चंद लाइनों के आगे लिखते हैं:- "ये वाकिया तुम्हारे लिए नसीहत था और तुमने उसको खेल तमाशा बना लिया" (बहारे शरीअत, हिस्सा16,स.248)
हज़रत मौलाना शाह मुफ़्ती अजमल साहब सम्भली फरमाते हैं:-  अब चूंकि ताजियेदारी बहुत ममनूआत शरइया और उमूरे नाजाइज़ पर मुश्तामिल है, लिहाज़ा ऐसी सही नक़्ल भी नहीं बनानी चाहिए। (फतावा अजमलिया, जि.4, स.15)
हज़रत मौलाना हशमत अली खां बरेलवी फरमाते हैं:-
ताज़िये बनाना उन्हें बाजे ताशे के साथ धूम धाम से उठाना उनकी ज़ियारत करना उनका अदब और ताज़ीम करना, उन्हें चूमना, उनके आगे झुकना और आँखों से लगाना, बच्चों को हरे कपडे पहनना घर घर भीक मंगवाना, कर्बला जाना वगैरह वगैरह शरअन नाजाइज़ व गुनाह है। (शमए हिदायत, हिस्सा-सोम, स.30)
फ़क़ीहे मिल्लत मुफ़्ती जलालुद्दीन साहब अमजदी फरमाते हैं:-  हिन्दुस्तान में जिस तरह के आमतौर पर ताज़ियादारी राइज़ है वो बेशक हराम व नाजाइज़ व बिदअत सय्यअह है। (फतावा फैज़ुर्रसूल, जि.2, स.563)
हज़रत मौलाना गुलाम रसूल सईदी लिखते हैं:-  "अपने सीने और चेहरे पर तमाचे लगाना, बाल नोचना, कपड़े फाड़ना, हाय हाय करना और चीख़ना चिल्लाना और वो तमाम काम करना जो शियों के यहाँ मातमे हुसैन के नाम पर किये जाते हैं ये सब काम हराम हैं।" (शरह सही मुस्लिम, जि.1, स.495)
बहरुलउलूम हज़रत मुफ़्ती अब्दुलमन्नान साहब फरमाते हैं:-  "आजकल आमतौर से जो ताज़िये बनाते हैं, उसका बनाना और रखना इस सिलसिले में जो मरासिम अदा किए जाते हैं सब नाजाइज़ व हराम हैं।" (फतावा बहरुलउलूम, जि.5, स.448)
यहाँ ये भी बात क़ाबिले ज़िक़्र है कि 1388 हिजरी में अब से तक़रीबन 50 साल पहले ताज़ियादारी के हराम व नाजाइज़ होने से मुतअल्लिक़ एक फ़तवा मरकज़े अहले सुन्नत बरेली शरीफ़ से शाइअ हुआ था जिस पर उस ज़माने के हिन्दुस्तान व पाकिस्तान के मुख़्तलिफ़ शहरों के 75 बड़े बड़े सुन्नी उलमा-ए-किराम ने दस्तख़त किये थे, सभी ने ताज़ियादारी के हराम और नाजाइज़ होने की तसदीक़ की थी, और वो फ़तवा उस ज़माने में पोस्टर की शक़्ल में शाइअ किया गया था, इस की तफसील उलमा ए किराम के नाम के साथ हज़रत मौलाना मुफ़्ती जलालुद्दीन साहब अलैहिर्रहमा की तस्नीफ़ "खुतबाते मुहर्रम" स.469 पर देखी जा सकती है, गोया की ताजियेदारी हराम होने पर सुन्नी उलमा का इत्तिफाक है। इस सब के होते हुए ये कहना कि ताज़ियादारी से रोकना वहाबियों का काम है, जिहालत, नादानी और नावाकिफी है।
कुछ लोग बअज बुज़ुर्गाने दीन और औलियाए किराम के नाम गिना कर ये प्रोपगंडे करते हैं कि फलां बुज़ुर्ग ने ताज़िया बनवाया फलां ने कंधा दिया फलां ने ताज़िये का इस्तक़बाल किया देख कर खड़े हो गए, ये सब गढ़ी हुई कहानियां है, अवाम को बरगलाने और बहकाने के लिए गढ़ रखी हैं, किसी भी मुस्तनद मोअतबर ज़िम्मेदार आलिम की लिखी हुई किताब में ऐसा कोई वाकिया नहीं है, दर असल ताज़ियादारी को जाइज़ कहने वालों को क़ुरआन व हदीस या आइम्मा किराम की किताबों से कोई सुबूत नहीं मिलता तो गढ़ गढ़कर हिक़ायते बयान करते हैं।

(मुहर्रम मे क्या जाइज़ ?क्या नाजाइज़ ? 30)

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